Founder Message

संस्थापक संदेश | श्री श्री 1008 पंचदशनाम जूना त्रिजटा अघोरी अखाड़ा

संस्थापक संदेश

अघोर परम्परा, शिव चेतना और मानव सेवा का पावन मार्गदर्शन

Founder Message

संस्थापक का संदेश

सनातन धर्म की दिव्य अघोर परंपरा केवल साधना का मार्ग नहीं, बल्कि मानवता, करुणा, आत्मज्ञान और शिवत्व की अनुभूति का पवित्र पथ है।

हमारे पूज्य गुरुओं एवं सिद्ध अघोर संतों की कृपा से यह परंपरा युगों से लोककल्याण, आध्यात्मिक जागरण और सेवा का कार्य करती आ रही है।

भगवान लकुलीश, जिन्हें शिव के 28वें अवतार के रूप में माना जाता है, उन्होंने पाशुपत एवं अघोर तत्त्वज्ञान को पुनः स्थापित किया।

लकुलीश परंपरा हमें यह शिक्षा देती है कि साधना का वास्तविक उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सिद्धि नहीं, बल्कि आत्मा का शिव में विलय, समभाव, त्याग एवं सम्पूर्ण सृष्टि में परम चेतना का अनुभव करना है।

अघोर मार्ग उसी दिव्य शिवज्ञान का जीवंत स्वरूप है, जिसमें साधक भय, भेदभाव, मोह और अहंकार से मुक्त होकर पूर्ण करुणा, निर्भयता और आत्म-बोध की ओर अग्रसर होता है।

हमारा यह अखाड़ा केवल एक आध्यात्मिक संस्था नहीं, बल्कि साधना, सेवा, सनातन संस्कृति और मानवता के संरक्षण का पवित्र केंद्र है।

हमारा उद्देश्य गुरु-शिष्य परंपरा, शिव साधना, अघोर ज्ञान, तंत्र साधना और धर्म रक्षा को आने वाली पीढ़ियों तक जीवंत रखना है।

साथ ही मानव सेवा, गौ सेवा, अन्न सेवा, आध्यात्मिक मार्गदर्शन और समाज कल्याण के माध्यम से शिवत्व का प्रकाश जन-जन तक पहुँचाना भी हमारा संकल्प है।

मैं सभी साधकों, श्रद्धालुओं और सेवकों से निवेदन करता हूँ कि वे साधना, अनुशासन, सेवा और करुणा के इस पवित्र मार्ग पर अग्रसर होकर मानवता और सनातन धर्म की सेवा में अपना योगदान दें।

हर जीव में शिव का दर्शन ही अघोर है।

संस्थापक के मार्गदर्शक सिद्धांत

साधना, सेवा और सनातन चेतना के माध्यम से जीवन को शिवमय बनाना।

साधना

आत्म-जागरण और शिव तत्व की अनुभूति।

सेवा

मानवता के प्रति निःस्वार्थ समर्पण।

अनुशासन

साधक जीवन की मर्यादा और संयम।

करुणा

हर जीव में शिव तत्व का दर्शन।

“अघोर मार्ग भय नहीं, बल्कि शिवत्व की अनुभूति है।”

साधना, सेवा और आत्म-जागरण के माध्यम से जीवन को शिवमय बनाने की यह पावन यात्रा है।

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